The History Of The Internet World Is Fast Disappearing, These Figures Are Witnesses – तेजी से मिट रहा है इंटरनेट की दुनिया का इतिहास, ये आंकड़े हैं गवाह

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2005 में एलेक्स ट्यू के दिमाग में करोड़ों रुपये का एक आइडिया आया। 20 बरस के एलेक्स के सामने चुनौती थी कि 3 साल की बिजनेस की डिग्री की फीस कैसे भरें। उन्हें लग रहा था कि कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। तो, उन्होंने एक नोटपैड पर लिखा-‘कैसे बनें करोड़पति।’ करीब 20 मिनट बाद एलेक्स के जेहन में जो बात आई, वो उनकी नजर में इस सवाल का जवाब था।

एलेक्स ट्यू ने मिलियन डॉलर होमपेज नाम की वेबसाइट बनाई। इसका मॉडल बहुत ही साधारण था। इस वेबसाइट पर दस लाख पिक्सेल थे। हर पिक्सेल एक विज्ञापन का ठिकाना था। कोई भी एक डॉलर प्रति पिक्सेल के हिसाब से 100 पिक्सेल खरीद कर उस पर अपना विज्ञापन दे सकता था। आप ने एक बार जो पिक्सेल खरीद लिए, वो हमेशा के लिए आप के हो गए। जब दस लाख पिक्सेल बिक जाते, तो एलेक्स करोड़पति बन जाते। कम से कम एलेक्स की योजना तो यही थी।

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एलेक्स ट्यू ने मिलियन डॉलर होमपेज को 26 अगस्त 2005 को लॉन्च किया। इसे तैयार करने में ट्यू को 50 डॉलर की भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ी थी। विज्ञापन देने वालों ने पिक्सेल खरीदे और इन पर अपने प्रॉडक्ट के लिंक दिए, जिन तक पहुंचा जा सकता था। हर पिक्सेल में विज्ञापन के बारे में एक छोटी सी लाइन भी लिखी होती थी एक तस्वीर के साथ।

एक महीने के भीतर ही इस पेज के चर्चे थे। मीडिया में भी एलेक्स की वेबसाइट चर्चित हुई। जनवरी 2006 में दस लाख पिक्सेल के आखिरी एक हजार पिक्सेल भी बिक गए। एलेक्स ट्यू अब करोड़पति बन गए थे। आज भी उनकी वेबसाइट चल रही है। जबकि इसे लॉन्च किए हुए 13 साल हो चुके हैं। इसके बहुत से ग्राहक जैसे ब्रिटेन का द टाइम्स अखबार, ट्रैवेल कंपनी चीपफ्लाइट्स।कॉम और याहू जैसी कंपनियों ने लंबे वक्त तक पैसे देकर इस पर अपना प्रचार किया है। आज भी हजारों लोग इसे रोजाना देखते हैं।

एलेक्स ट्यू ने इस वेबसाइट को काफी पहले बेच दिया था। अब वो एक एप चलाते हैं, जो लोगों को ध्यान योग सिखाता है। उनकी वेबसाइट इंटरनेट के शुरुआती दिनों का म्यूजिम बन चुकी है। 15 साल में कोई भी चीज इतनी पुरानी नहीं पड़ती कि उसका इतिहास लिखा जाए। उसका म्यूजियम बनाया जाए। पर, इंटरनेट की रफ्तार बड़ी तेज है। जो आज सितारा है, वो कल गर्दिश में हो जाता है। मिलियन डॉलर होमपेज को ही लीजिए। आज इसकी साइट के पिक्सेल पर मिलने वाले 40 फीसदी लिंक मुर्दा हो चुके हैं। मतलब उनकी कंपनियों की वेबसाइटें बंद हो चुकी हैं। कइयों ने नई वेबसाइटें बना ली हैं। मिलियन डॉलर होमपेज इस बात की मिसाल है कि इंटरनेट में कितनी तेजी से वेबसाइट खंडहर बन जाती हैं।

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एक दशक पहले अमरीका की मशहूर कंपनी अमरीकन ऑनलाइन वेबसाइट चलाती थी। इसमें लोग गीत-संगीत और साहित्य के बारे में लेख लिखते थे। इंटरव्यू छपते थे। फेसबुक और ट्विटर के जरिए भी इस वेबपेज को खूब लाइक्स और लोकप्रियता मिल रही थी। स्मार्टफोन के बढ़ते दायरे ने इस वेबपेज की लोकप्रियता में काफी इजाफा किया। लेकिन अप्रैल 2013 मे अमरीकन ऑनलाइन ने अचानक ये वेबसाइट बंद करने का फैसला किया। इसके साथ ही सैकड़ों लेखकों, संपादकों का काम-काज हवा में उड़ गया। वेबसाइट बंद यानी इस पर मौजूद हर दस्तावेज का खात्मा।

आज की तारीख में अमरीकन ऑनलाइन के इस वेबपेज की कुछ ही चीजें बची हैं, जिनका जिक्र दूसरी वेबसाइट्स पर किया गया था। यानी इंटरनेट की दुनिया का इतिहास बड़ी तेजी से मिट रहा है। अच्छी बात है कि कुछ लोगों को इस डिजिटल इतिहास को सहेजने की फिक्र हो रही है। अमरीका के सैन फ्रांसिस्को शहर की कंपनी इंटरनेट आर्काइव ऐसी बंद होती वेबसाइट और इंटरनेट पर खत्म होते पन्नों को सहेजने का काम करती है। इसकी शुरुआत 1990 के दशक के आख़िरी दिनों में कंप्यूटर इंजीनियर ब्रयूस्टर काहले ने की थी। ये उन गिने-चुने संगठनों में से एक है जो इंटरनेट के इतिहास को सहेजने का काम कर रही हैं। पुरानी वेबसाइट, बंद होने वाले वेब पेज और इंटरनेट पर मौजूद पुराने कंटेंट को संजोने का काम मुश्किल और खर्चीला दोनों ही है।

ब्रिटिश लाइब्रेरी अब पुराने इंटरनेट के पन्नों को संरक्षित करने का काम कर रही है। बहुत से अखबारों के प्रिंट एडिशन वेबसाइट में तब्दील हो गए हैं। ऐसे में उन्हें आर्काइव कर के रखना नई तरह की चुनौती है। अखबारों की वेबसाइट को सहेजना इसलिए चुनौतीपूर्ण है कि कई बार अखबारों के मालिक बदल जाते हैं। या कंपनी बंद हो जाती है, तो अचानक से कोई वेबसाइट बंद कर दी जाती है। अगर इन्हें सहेजा न गया तो ऐसे अखबारों के डिजिटल पन्ने हम हमेशा के लिए खो बैठते हैं।

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इंटरनेट को सहेजना मामूली काम नहीं। हर लम्हे यहां कुछ न कुछ नया होता है। फोटो, ब्लॉग, वेबसाइट और न जाने क्या-क्या। दस्तावेजों का ऊंचा पहाड़ है, जो हर पल बड़ा होता जा रहा है। कई खबरें हैं, लेख हैं और दूसरे दस्तावेज हैं जिन पर लगातार कमेंट्स और लाइक होते जा रहे हैं। वैसे तो आज डिजिटल आर्काइव सस्ता हो गया है। लेकिन, इन्हें सहेजने में फिर भी भारी ख़र्च है। डेम वेंडी पूछती हैं कि, “इन वेब पन्नों को सहेजने का खर्च उठाएगा कौन?

ब्रिटेन में वेबपेज के संरक्षण की जिम्मेदारी मुख्य तौर पर ब्रिटिश लाइब्रेरी निभा रही है। यूके वेब आर्काइव के नाम से ये एक संस्था चलाती है, जो ब्रिटेन में बंद हो रही वेबसाइट को उनकी इजाजत से सहेजती है। ये काम 2004 से ही चल रहा है। इसके प्रबंधक जैसन वेब्बर कहते हैं कि डिजिटल लाइब्रेरी बनाना बहुत बड़ा काम है। इतना बड़ा कि लोगों को इसका अंदाजा नहीं है। सैन फ्रांसिस्को के इंटरनेट आर्काइव ने पहला वेबपेज 1996 में सहेजा था, यानी इंटरनेट के आने के पांच साल बाद। दुनिया का पहला वेबपेज अब नहीं रहा। इसकी एक छोटी सी झलक आप वर्ल्ड वाइड वेब कंसर्शियम पर ही देख सकते हैं। इसी तरह ब्रिटेन में 1996 के बाद ही वेबसाइट व्यापक रूप से प्रचलित हुईं ब्रिटिश लाइब्रेरी हर साल ब्रिटेन में चलने वाली तमाम वेबसाइट का हाल जानती है। जो बंद हो गई हैं या उसके कगार पर हैं, उन्हें सहेजने का काम, मालिक की मंजूरी लेकर शुरू कर दिया जाता है। एक वेबसाइट सहेजने के लिए कम से कम 500 एमबी का स्पेस चाहिए।

गूगल जैसी कंपनी के साथ भी ऐसा हो सकता है। फेसबुक से मुकाबले के लिए गूगल ने गूगल प्लस नाम की वेबसाइट शुरू की थी। जिसे हाल ही में, 2 अप्रैल को अचानक बंद कर दिया गया। वेब्बर कहते हैं कि, ‘फेसबुक पर फोटो डालने का मतलब ये नहीं कि वो वहां हमेशा रहेगी। एक दिन ऐसा आएगा जब फेसबुक बंद हो जाएगा। ठीक उसी तरह जैसे दूसरी कई बड़ी वेबसाइट की उम्र पूरी हो गई। वो भी अचानक।’ एक और मसला भी है। ख़बरों की दुनिया के वेबपेज अगर सुरक्षित नहीं किए जाते, तो उनका न होना सरकारों के लिए फायदेमंद होगा। एक ही पक्ष की स्टोरी आप को पता चलेगी। कोई खबर अगर सरकार के कारनामों का पर्दाफाश करने वाली है और उसे संरक्षित नहीं किया गया, तो जनता का नुकसान होगा।

खास बातें

तेजी से खत्म हो रहा इंटरनेट की दुनिया का इतिहास
डिजिटल इतिहास को समेटना है मुश्किल
डिजिटल लाइब्रेरी बनाना है बड़ा काम

2005 में एलेक्स ट्यू के दिमाग में करोड़ों रुपये का एक आइडिया आया। 20 बरस के एलेक्स के सामने चुनौती थी कि 3 साल की बिजनेस की डिग्री की फीस कैसे भरें। उन्हें लग रहा था कि कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। तो, उन्होंने एक नोटपैड पर लिखा-‘कैसे बनें करोड़पति।’ करीब 20 मिनट बाद एलेक्स के जेहन में जो बात आई, वो उनकी नजर में इस सवाल का जवाब था।

एलेक्स ट्यू ने मिलियन डॉलर होमपेज नाम की वेबसाइट बनाई। इसका मॉडल बहुत ही साधारण था। इस वेबसाइट पर दस लाख पिक्सेल थे। हर पिक्सेल एक विज्ञापन का ठिकाना था। कोई भी एक डॉलर प्रति पिक्सेल के हिसाब से 100 पिक्सेल खरीद कर उस पर अपना विज्ञापन दे सकता था। आप ने एक बार जो पिक्सेल खरीद लिए, वो हमेशा के लिए आप के हो गए। जब दस लाख पिक्सेल बिक जाते, तो एलेक्स करोड़पति बन जाते। कम से कम एलेक्स की योजना तो यही थी।

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एलेक्स ट्यू ने मिलियन डॉलर होमपेज को 26 अगस्त 2005 को लॉन्च किया। इसे तैयार करने में ट्यू को 50 डॉलर की भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ी थी। विज्ञापन देने वालों ने पिक्सेल खरीदे और इन पर अपने प्रॉडक्ट के लिंक दिए, जिन तक पहुंचा जा सकता था। हर पिक्सेल में विज्ञापन के बारे में एक छोटी सी लाइन भी लिखी होती थी एक तस्वीर के साथ।

एक महीने के भीतर ही इस पेज के चर्चे थे। मीडिया में भी एलेक्स की वेबसाइट चर्चित हुई। जनवरी 2006 में दस लाख पिक्सेल के आखिरी एक हजार पिक्सेल भी बिक गए। एलेक्स ट्यू अब करोड़पति बन गए थे। आज भी उनकी वेबसाइट चल रही है। जबकि इसे लॉन्च किए हुए 13 साल हो चुके हैं। इसके बहुत से ग्राहक जैसे ब्रिटेन का द टाइम्स अखबार, ट्रैवेल कंपनी चीपफ्लाइट्स।कॉम और याहू जैसी कंपनियों ने लंबे वक्त तक पैसे देकर इस पर अपना प्रचार किया है। आज भी हजारों लोग इसे रोजाना देखते हैं।


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एलेक्स ट्यू अब चलाते हैं योग सिखाने वाले एप

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Catherine Feather is a Data Engineer with expertise in Python, Pandas, Numpy, Web Scraping, Pyspark, SQL and MongoDB. She analyses the business concerns and supports the company to manage them adequately. She is also a bookworm so, when not working you will find her lost in a book. Jane Austen is her favorite author!

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